त्याग, साधना, सादगी, प्रबुद्धता एवं करुणा से ओतप्रोत आप आदिवासी जाति की अस्मिता की सुरक्षा के लिए तथा मानवीय मूल्यों को प्रतिष्ठापित करने के लिए सतत प्रयासरत हैं. मानो वे दांडी पकडे गुजरात के उभरते हुए ‘गांधी’ हैं. इसी आदिवासी माटी में 19 मई, 1974 को एक आदिवासी परिवार में जन्म गणि राजेन्द्र विजयजीम मात्र ग्यारह वर्ष की अवस्था में जैन मुनि बन गये. बीस से अधिक पुस्तकें लिखने वाले इस संत के भीतर एक ज्वाला है, जो कभी अश्लीलता के खिलाफ आन्दोलन करती हुए दिखती है, तो कभी जबरन धर्म परिवर्तन कराने वालों के प्रति मुखर हो जाती है. इस संत ने स्वस्थ एवं अहिंसक समाज निर्माण के लिये जिस तरह के प्रयत्न किये हैं, उनमें दिखावा नहीं है, प्रदर्शन नहीं है, प्रचार-प्रसार की भूख नहीं है, किसी सम्मान पाने की लालसा नहीं है, किन्हीं राजनेताओं को अपने मंचों पर बुलाकर अपने शक्ति के प्रदर्शन की अभीप्सा नहीं है. अपनी धून में यह संत आदर्श को स्थापित करने और आदिवासी समाज की शक्ल बदलने के लिये प्रयासरत है और इन प्रयासों के सुपरिणाम देखना हो तो कंवाट, बलद, रंगपुर, बोडेली आदि-आदि आदिवासी क्षेत्रों में देखा जा सकता है.
यात्राएं गणिजी के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है, वे इन यात्राओं में प्रतिदिन सुबह से शाम तक हजारों लोगों से सम्पर्क करते हैं, उन्हें ग्रामीण भाषा में समझाते हैं. उन्हें अपना गौरव प्राप्त करने का, अपने होने का भान कराते हैं. उनका कहना है कि आदिवासी समाज को उचित दर्जा मिले. वह स्वयं समर्थ एवं समृद्ध है, अतः शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधओं के लिये स्वयं आगे आएं. एक तरह से एक संतपुरुष के प्रयत्नों से एक सम्पूर्ण पिछडा एवं उपेक्षित आदिवासी समाज स्वयं को आदर्श रूप में निर्मित करने के लिये तत्पर हो रहा है, यह एक अनुकरणीय एवं सराहनीय प्रयास है.
इतना ही नहीं यह संत गृहस्थ जीवन को त्यागकर गृहस्थ जीवन को सुखी बनाने के लिये जुटा है, इनका मानना है कि व्यक्ति-व्यक्ति से जुड़कर ही स्वस्थ समाज एवं राष्ट्र की कल्पना आकार ले सकती है. स्वस्थ व्यक्तियों के निर्माण की प्रयोगशाला है - परिवार. वे परिवार को सुदृढ़ बनाने के लिये ही सुखी परिवार अभियान लेकर सक्रिय है. उनका मानना है कि समाज में सुखी गृहस्थ जीवन व्यतीत करने के लिए सहिष्णुता की बहुत जरूरत है. गणि राजेन्द्र विजयजी का मानना है कि इन्सान की पहचान उसके संस्कारों से बनती है. संस्कार उसके समूचे जीवन को व्याख्यायित करते हैं. संस्कार हमारी जीवनी शक्ति है, यह एक निरंतर जलने वाली ऐसी दीपशिखा है जो जीवन के अंधेरे मोड़ों पर भी प्रकाश की किरणें बिछा देती है. गणि राजेन्द्र विजयजी बच्चों को कच्चे घड़े के समान मानते हैं. उनका कहना है उन्हें आप जैसे आकार में ढालेंगे वे उसी आकार में ढल जाएंगे. बच्चों को संस्कारी बनाने की दृष्टि से गणि राजेन्द्र विजय विशेष प्रयास कर रहे हैं.
सुखी परिवार अभियान द्वारा गुजरात के छोटा उदयपुर एवं बडोदरा जिले के आदिवासी अंचल कवांट में निर्मित हुए एकलव्य आवासीय मॉडल विद्यालय एक क्रांतिकारी मोड है. आदिवासी जनजीवन के लिए सेवा, शिक्षा, जनकल्याण की विशिष्ट योजनाएं सुखी परिवार अभियान के द्वारा लम्बे समय से संचालित की जा रही है. मेरी दृष्टि में गणि राजेन्द्र विजयजी के उपक्रम एवं प्रयास आदिवासी अंचल में एक रोशनी का अवतरण है, यह ऐसी रोशनी है जो हिंसा, आतंकवाद, नक्सलवाद, माओवाद जैसी समस्याओं का समाधान बन रही है. गणि राजेन्द्र विजयजी के आध्यात्मिक आभामंडल एवं कठोर तपचर्या का ही परिणाम है आदिवासी समाज का सशक्त होना. सर्वाधिक प्रसन्नता की बात है कि अहिंसक समाज निर्माण की आधारभूमि गणि राजेन्द्र विजयजी ने अपने आध्यात्मिक तेज से तैयार की है.
प्रेषकः ललित गर्ग, ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट, 25 आई0 पी0 एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92, E-Mail : lalitgarg11@gmail.com
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